Sunday, 17 September 2017

लिव इन रिलेशनशिप की एक प्राचीन परंपरा

सीरवी संदेश पत्रिका में प्रकाशित लेख

सीरवी समाज-नाथा प्रथा का बढ़ता दुरूपयोग (लिव इन रिलेशनशिप की एक प्राचीन परंपरा)

न तो शाम का पता और न कल का,

फिर भी न जाने किस उम्मीद में दौड रहे हैं।😊

 

लिव इन रिलेशनशिप पर हमेशा से बहस चलती रही है। आधुनिक सीरवी समाज में प्रेमी-प्रेमिका के शादी से पहले एक साथ एक छत के नीचे रहने की बात अब आसानी से स्‍वीकार की जाने लगी है, लेकिन इस पर यह आरोप लगता रहा है कि यह पश्चिमी देशों और संस्‍कृति की नकल है। लेकिन इस देश की रीति-रिवाजों व परंपरओं पर गौर करें तो हम पाते हैं कि यहां के कुछ समाजों में भी live in relationship का चलन रहा है और आज भी है। यह अलग बात है कि हमारे देश में यह एक सामाजिक परंपरा रही है, जिसमें परिवार और पंचायतों की मर्जी भी शामिल होती थी।

* सीरवी समाज का नाता प्रथा ऐसी ही एक प्रथा है, जिसमें शादी की ही तरह साथ रहने की आजादी हासिल होती है। इसमें शादी जैसे सभी रीति-रिवाज होते हैं और इनसे उत्‍पन्‍न संतान को सामाजिक मान्‍यता भी मिलती है।

* इसमें पुरुषों और महिलाओं को अपनी पंचायत की मंजूरी के बाद कभी भी अपने साथी को बदलने का अधिकार और सहूलियत प्राप्त है।

* इसके तहत एक महिला अपने पति को छोड़कर किसी दूसरे मर्द के साथ कभी भी जा सकती है। इसके लिए उसके नए पति द्वारा उसके पुराने पति को एक निश्चित रकम देनी पड़ती है।

* नाता प्रथा की वजह से विधवाओं व परित्‍यक्‍ता स्त्रियों को सामाजिक जीवन जीने का अवसर प्रदान करना था।

आज भी सीरवी समाज में यह अनोखी परंपरा कायम है। नाता परंपरा के तहत कोई भी विवाहित महिला या पुरुष आसानी से तलाक लेकर और पूर्व निर्धारित राशि अदा करके दूसरी शादी कर सकता है। इसमें महिला और पुरुष दोनों को निश्चित राशि अदा करके कभी भी अपने जीवन-साथी को बदलने की आजादी है। इसके लिए उन्हें सिर्फ पंचायत को बताना होता है। पंचायत के सामने वे पहली शादी से हुए बच्चे के पालन-पोषण और अदा की जाने वाली धनराशि आदि मुद्दों पर अपनी परेशानी रखते हुए राहत की मांग कर सकते हैं। नाता परंपरा में ब्राह्मण, राजपूत और जैन को छोड़कर बाकी सभी जातियों में विशेषकर गुर्जरों सीरवियों घासीयो में यह परंपरा लोकप्रिय है।

कलर्स टीवी की 'बालिका वधु' तो आपको याद होगी

कलर टीवी पर बालिका वधु में भी नाता प्रथा के तहत आनंद की सहेली फूली का विवाह उसके देवर से दिखाया गया है। फूली बचपन में ही विधवा हो गई थी, जिसके बाद उसके ससुराल वालों ने उसे निकाल दिया था, लेकिन बड़ी होने पर सही ससुराल वाले अपने छोटे बेटे के लिए फूली का हाथ मांगने उसके मायके पहुंचे थे। फूली के देवर की पत्‍नी भी उसे छोड़कर जा चुकी थी। इस तरह देखते हैं कि नाता प्रथा दो उजड़ चुके लोगों को फिर से सामाजिक रूप से जीवन जीन का अवसर प्रदान करती है।

प्रेमी-प्रेमिका के साथ जीवन जीने का बेहतर विकल्‍प

यदि किसी स्‍त्री या पुरुष का किसी से प्रेम हो, लेकिन उसकी शादी उससे न होकर किसी अन्‍य से घरवाले जबरदस्‍ती करा दें तो वह नाता प्रथा का उपयोग अपने प्रेमी या प्रेमिका के साथ रहने के लिए करता है। शादी के बाद भी यदि किसी शादीशुदा महिला या पुरुष को किसी और से प्यार हो जाए तो वह एक निश्चित रकम अदा करके अपने नए प्यार के साथ जा सकता है। झटपट शादी की सुविधा सीरवी समाज में आज भी खूब हो रही है। यह एक शादी में जीवन भर घुट-घुट कर रहने से कहीं अच्‍छा है।

वर्तमान की एक घटना

पश्चिम राजस्‍थान के के सिहाना गांव का एक पुरुष अपनी शादी से खुश नहीं था। इसके लिए उसने नाता परंपरा के माध्यम से दूसरी शादी करने की योजना बनाई। उस आदमी ने एक दलाल को पकड़ा और अपनी विवाह की इच्छा जताई। दलाल ने एक ऐसी महिला का नाम उसे सुझाया, जिसके पति ने उसे घर से निकाल दिया था। वह महिला अपने पांच साल के बेटे के साथ अपने मां-बाप के साथ रह रही थी। उसके मां-बाप बेहद गरीब थे।

दलाल ने दूसरी शादी करने के लिए तैयार उस आदमी को उस महिला से मिला दिया। शुरुआती बातचीत के बाद उन दोनों में शादी करने की सहमति बन गई और तय शर्तो के अनुसार उस आदमी ने 80 हजार रुपये देकर पंचायत की मंजूरी के बाद शादी कर लिया। इस राशि में से उसे उस दलाल को एक तिहाई रकम देनी पड़ी और बाकी की रकम महिला के माता-पिता को महिला के बच्चे के पालन-पोषण करने के लिए दिए गए। इस प्रकार उस महिला की शादी भी हो गई और उसके बच्चे के पालन-पोषण का सहारा भी मिल गया, अन्यथा ऐसी शादियों में अमूमन बच्चे या तो अनाथ हो जाते हैं या फिर नए पिता की प्रताड़ना सहते रहते हैं।

नाता प्रथा की वजह से महिलाओं और पुरुषों को बड़ी आसानी से तलाक मिल जाता है और उनका पुनर्विवाह भी हो जाता है। इसमें उन्‍हें अदालती झंझटों से मुक्ति मिल जाती है।

नाता परंपरा के तहत औरतों की अदला-बदली तेजी से उभरते हुए व्यापार का रूप ले चुकी है। अब तो यह गांवों की सीमा से बाहर निकलकर कस्‍बों तक फैल चुकी है। यहां शादी की जोड़ी मिलाने वाले दलालों की पूरी फौज खड़ी हो चुकी है। इसमें दलाल को 30 फीसदी तक का अच्छा-खासा कमीशन मिल जाता है। लेकिन इस कमीशन के चलते कई धूर्त दलाल महिलाओं को होने वाले पति से भारी भरकम रकम मांगने के लिए उकसाते हैं ताकि उनका कमीशन बढ़ जाए। इससे कई महिलाओं का जीवन आगे जाकर नरक बन जाता है।

अधिकांश पुरुष पत्नियों को नियंत्रण में रखने और उन्‍हें दबाने के लिए इस परंपरा की आड़ लेते हैं। बार-बार में पत्नियों को छोड़ देने और दूसरी शादी करने की धमकी दी जाती है ताकि उन पर लगाम लगाई जा सके।

इस परंपरा के तहत सीरवी समाज में शादीशुदा महिलाओं को जबरन बेचने की कुछ घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। कई पुरुष पत्नियों की अदला-बदली के लिए भी इस परंपरा की आड़ ले रहे हैं और अपनी यौन पिपासा शांत कर रहे हैं। वर्तमान में सीरवी समाज की पंचायतों के पास नियंत्रण की माकूल व्‍यवस्‍था नहीं होने के कारण एक अच्‍छी परंपरा कई मामलों में आज महिलाओं के शोषण का हथियार बन चुकी है

☺😊: मुम्बई का एक सीरवी उद्योग पति अपनी बेटे की पत्नी को वाइफ स्वैपिंग के खेल में दूसरों को परोस कर अपना कारोबार बढ़ाना चाह रहा था | बहु ने मना किया तो उसने  बेटे पर प्रेसर करके उसको तलाक के लिए बोल दिया।अब 1 बच्चे की माँ वो अपने पापा के घर रह रही है।

….    पुणे के 1 सीरवी परिवार का रिश्ता अदला बदली प्रथा से पाली के सीरवी परिवार से हुई।पहले जोड़े की शादी 2010 में हुईं और 1 उनके 1 बच्चा हुआ। 2014 में दूसरे जोड़े की शादी हुई लेकिन थोड़े दिन बाद ही पता चला लड़का चरित्रहीन है , वो किसी शादीशुदा औरत को लेकर भागा और पकड़ा गया।तो दूसरे जोड़े की लड़की ने वहां उस चरित्रहीन लड़के के साथ जाने से मना कर दिया।

इस खामियाजा भुगतना पड़ा पहले जोड़े को और एक मासूम को जिसकी तो कोई भी गलती नही थी । समाज के पंचो ने सामाजिक दबाव और परिवारिक और इमोशनल तरीके से पहले जोड़े का भी तलाक करा दिया।

ये तो वे कुछ घटनाएँ हैं जो सामने आ जाती हैं कभी कभी, लेकिन ऐसी कितनी ही बातें हैं जो कभी सामने नहीं आती | हमने कभी यह जानने की कोशिश क्यों नहीं की कि कारण क्या हैं ? क्यों नहीं कोशिश करते कि इन सभी घटनाओं के मूल पर जाकर उस दोष को दूर करें जो इन सब घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं ?

समाज तो पशुओं का भी होता है और उनके भी अपने कुछ नियम कानून होते हैं, लेकिन वहाँ इतना उपद्रव नहीं होता है जितना कि मानव समाज में | हम न तो मानव बन पाए और न ही पशु, और खोजने निकले हैं ईश्वर को कर्मकांड और पाखंड के मार्ग से !!!

आई पंथ की आवश्यकता पड़ी ताकि सीरवी समाज को एक नियम और मर्यादा में रख कर एक दूसरे के लिए सहयोगी बना पायें | सभी को एक दूसरे से बाँध कर रख पायें | लेकिन क्या ऐसा हो पा रहा है ? आज धर्म केवल राजनीति करने और दंगा करवाने के लिए ही एक कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल हो रहा है | दूसरों को नीचा दिखाने का हम कोई अवसर नहीं चूकते लेकिन कोई भी धर्म अपने अपने गिरबान में झाँकने को तैयार नहीं है कि क्यों समाज बिखरता जा रहा है ? क्यों हम आदिम युग में वापस जा रहें हैं ?

एक समय था जब कपड़ों का आविष्कार नहीं हुआ था तब लोग कपड़े नहीं पहनते थे, लेकिन आज ? आज भी कपड़े पहनने के लिए कहना दकियानूसी बातें लगती हैं ? एक समय था जब नियम क़ानून नहीं थे और कोई भी किसीकी भी स्त्री के साथ सम्बन्ध बना सकता था, लेकिन आज वाईफ स्वैपिंग के नाम पर आधुनिक बने लोग वही काम कर रहें हैं ?

अधिकांश पुरुष पत्नियों को नियंत्रण में रखने और उन्‍हें दबाने के लिए इस परंपरा की आड़ लेते हैं। बार-बार में पत्नियों को छोड़ देने और दूसरी शादी करने की धमकी दी जाती है ताकि उन पर लगाम लगाई जा सके।

इस परंपरा के तहत सीरवी समाज में शादीशुदा महिलाओं को जबरन बेचने की कुछ घटनाएं भी सामने आ चुकी हैं। कई पुरुष पत्नियों की अदला-बदली के लिए भी इस परंपरा की आड़ ले रहे हैं और अपनी यौन पिपासा शांत कर रहे हैं। वर्तमान में सीरवी समाज की पंचायतों के पास नियंत्रण की माकूल व्‍यवस्‍था नहीं होने के कारण एक अच्‍छी परंपरा कई मामलों में आज महिलाओं के शोषण का हथियार बन चुकी है।

लेखक

नरेंन सोलंकी

सीरवी संदेश पत्रिका में प्रकाशित लेख

2 comments:

  1. plz agr aap ese hi yh dalte rhenge to mujhe nhi lgta ki aap sirvi ho km se km esi chize mt likho mere samaj k bare m agr likhna hi ho to history likho seervi samaj k

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  2. live in relationship k bare m or kch mt likhna seervi apni bahu betiyo ki izzat krna jante h agr koi esa krta h to aap sirvi maha sabha me jar boliye yha agr dusri caste ka koi yh pdega to kya sochega vo seervi samaj k bare me

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